स्कूलों का बंद किया जाना शिक्षा की सुनियोजित मौत है
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Education Crisis India
सरकारी स्कूलों का बंद होना गरीब बच्चों के भविष्य पर सीधा असर.
शिक्षा का निजीकरण बढ़ने से असमानता में वृद्धि.
दूरी और संसाधनों की कमी से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित.
Kaushambi / देश में पिछले एक दशक से लगभग हर राज्य में स्कूल बंद करने का काम बहुत ही सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से जारी है। यह सिर्फ एक आँकड़ा भर नहीं है, बल्कि ग्रामीण और गरीब बच्चों के भविष्य पर सुनियोजित हमला है। पिछले दस वर्षों में देशभर में 93 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। हिन्दी भाषी प्रदेशों में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश इस मामले में सबसे आगे हैं, जबकि बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे प्रदेश भी पीछे नहीं हैं। मध्य प्रदेश में यह संख्या लगभग 30 हजार है और उत्तर प्रदेश में लगभग 25 हजार। सुदूर गांवों और गरीब इलाकों में, जहां सरकारी स्कूल ही बच्चों की पढ़ाई का एकमात्र साधन हैं, वहां सबसे अधिक स्कूलों की आवश्यकता है। ऐसे स्थानों के स्कूलों को बंद करना सरकार की मंशा को दर्शाता है कि वह नहीं चाहती कि गरीबों के बच्चे शिक्षित हों और वे भी आगे बढ़ सकें। सरकार इसे रेशनलाइजेशन या स्कूल मर्जर का नाम देती है। कहा जाता है कि जिन स्कूलों में कम बच्चे हैं, उन्हें बड़े स्कूलों में मिला दिया जाए ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके। लेकिन असलियत यह है कि इससे गरीब बच्चों के लिए पढ़ाई और कठिन हो रही है, वे शिक्षा से दूर हो रहे हैं। सरकारी स्कूलों में अधिकतर वही बच्चे पढ़ने जाते हैं जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, सामाजिक तौर पर देखें तो वंचित तबके के बच्चे ही ज्यादातर सरकारी स्कूलों में रह गए हैं। पहले गांव में ही स्कूल हुआ करते थे, लेकिन मर्जर के बाद बच्चों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। छोटे बच्चों और खासकर लड़कियों के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता है। कई परिवार सुरक्षा, खर्च और दूरी के साथ- साथ जागरूकता की कमी के कारण बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर देते हैं।
यह सवाल उठना जरूरी है कि आखिर सरकारी स्कूल बंद क्यों हो रहे हैं, जबकि निजी स्कूल लगातार बढ़ रहे हैं। देश में निजी स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी है और शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि अधिकतम मुनाफा बटोरने वाला कारोबार बन गई है। क्योंकि शिक्षा कॉरपोरेट के लिए सबसे फायदेमंद क्षेत्रों में से एक बन चुकी है। शिक्षा का बाजारीकरण इस तरह हो रहा है कि जो परिवार फीस दे सकते हैं, उनके बच्चों के लिए अच्छे स्कूल, अंग्रेजी शिक्षा, कंप्यूटर और कोचिंग उपलब्ध हैं। लेकिन गरीब परिवारों के बच्चे कमजोर सरकारी व्यवस्था पर निर्भर हैं। जब सरकार सरकारी स्कूलों को कमजोर करती है, तो गरीबों को मजबूरी में निजी स्कूलों की तरफ धकेला जाता है। यह सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक बदहाली, संसाधनों एवं शिक्षकों की कमी के कारण भी होती है। और जो इन स्कूलों की महंगी फीस और किताबों का बोझ नहीं उठा पाते, वे अपने आप ही शिक्षा के इस संगठित बाजारीकरण की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। सरकारी स्कूलों की हालत इसलिए भी खराब होती जा रही है क्योंकि वहां शिक्षक नहीं हैं। देशभर में शिक्षकों के लाखों पद खाली पड़े हैं। कई स्कूल एक या दो शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। कहीं पर्याप्त भवन नहीं है, कहीं शौचालय नहीं है, कहीं पानी नहीं है, कहीं बिजली नहीं है। ऐसे में बच्चे स्कूल क्यों आएंगे? सरकार पहले स्कूलों को कमजोर करती है, फिर कम नामांकन का हवाला देकर उन्हें बंद कर देती है। यही हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है। संसदीय रिपोर्टों में देशभर में लगभग 10 लाख शिक्षक पद खाली होने की बात कही गई है। वहीं गांव और शहर के बीच शिक्षा की खाई लगातार बढ़ रही है। शहरों के बच्चों के पास मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, कोचिंग, ऑनलाइन क्लास और नई तकनीकें हैं। वहीं गांव का बच्चा आज भी अच्छी किताब, शिक्षक और इंटरनेट के लिए संघर्ष कर रहा है। ग्रामीण इलाकों के बहुत से स्कूलों में अभी भी डिजिटल सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में समान अवसर केवल किताबी बात बनकर रह गया है।
सबसे चिंता की बात यह है कि सरकार लगातार शिक्षा का बजट कम करती जा रही है। भारत में शिक्षा पर कुल खर्च जीडीपी के लगभग 4 प्रतिशत के आसपास है, जबकि कई विकसित देशों में यह इससे कहीं अधिक है। हाल के बजट में शिक्षा पर खर्च लगभग 2.7 प्रतिशत जीडीपी के आसपास बना हुआ है, जो बताता है कि शिक्षा अभी भी सरकार की प्राथमिकता नहीं बन पाई है। अगर यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में गरीब और अमीर के बीच शिक्षा का अंतर और बढ़ेगा। गरीब बच्चे पढ़ाई छोड़कर मजदूरी, बाल विवाह या छोटे-मोटे कामों में लग जाएंगे। इससे देश की अर्थव्यवस्था भी कमजोर होगी, क्योंकि बिना पढ़े-लिखे और कुशल युवाओं के कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। सरकार को स्कूल बंद करने की नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत करने की जरूरत है। नए शिक्षकों की भर्ती हो, गांवों में छोटे स्कूल बचाए जाएं, इंटरनेट और कंप्यूटर जैसी सुविधाएं दी जाएं, और शिक्षा को अधिकार की तरह देखा जाए, न कि मुनाफे के बाजार की तरह। क्योंकि अगर स्कूल बंद होंगे, तो केवल इमारतें नहीं बंद होंगी, बल्कि लाखों गरीब बच्चों के सपने भी बंद हो जाएंगे। भारत में शिक्षा का अधिकार कानून बना जरूर है, लेकिन ईमानदाराना तरीके से इसे लागू करने की सरकार की मंशा दिखाई नहीं देती। 2025 तक देश में 3.5 लाख से अधिक निजी स्कूल खुल चुके हैं, जबकि सरकारी स्कूलों की संख्या घटकर 10 लाख से नीचे आ गई है। NEP 2020 आने के बाद भी डिजिटल डिवाइड बढ़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में 70 प्रतिशत स्कूलों में बिजली और इंटरनेट की सुविधा नहीं है। कहीं बिजली है भी तो पंखे खराब पड़े हैं, बल्ब तक नहीं हैं।
आज जब शहर के बच्चे AI टूल्स और कोडिंग सीख रहे हैं, वहीं गांव के बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। अब कोई वास्तविक प्रतिस्पर्धा नहीं बची है। RTE के तहत 25 प्रतिशत सीटें निजी स्कूलों में गरीबों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन यह व्यवस्था कहीं भी पूरी तरह लागू नहीं होती। कोरोना के बाद 40 प्रतिशत बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया। अगर यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा, तो 2030 तक 50 प्रतिशत ग्रामीण बच्चे अशिक्षित रह जाएंगे। बदहाल शिक्षा व्यवस्था किसी मुल्क की प्रगति का मार्ग प्रशस्त नहीं करती, बल्कि यह गर्त की तरफ बढ़ने के ही दरवाजे खोलती है।
डॉ. नरेश गौतम
सहायक प्रोफेसर,
समाज कार्य विभाग एस आर यू रायपुर